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भारतीय कालीन उद्योग की चुनौतियों पर वाणिज्य राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद के साथ अहम बैठक

               सम्वाददाता फारूक जाफरी की रिपोर्ट

नई दिल्ली, 13 मई 2025  

भारतीय कालीन उद्योग, जो अपनी हस्तकला और सांस्कृतिक धरोहर के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है, आज कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन मुद्दों को केंद्र सरकार तक पहुंचाने और समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में भारत सरकार के वाणिज्य राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद, सांसद श्री विनोद बिंद, कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (CEPC) के चेयरमैन श्री कुलदीप राज वाटल, निदेशक श्री संजय कुमार गुप्ता और कई प्रमुख निर्यातकों ने हिस्सा लिया। यह बैठक भारतीय कालीन उद्योग के भविष्य को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।


बैठक का उद्देश्य और प्रमुख मुद्दे

बैठक का मुख्य उद्देश्य भारतीय कालीन उद्योग के सामने आने वाली समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर करना और इनके समाधान के लिए नीतिगत हस्तक्षेप सुनिश्चित करना था। CEPC के चेयरमैन श्री कुलदीप राज वाटल ने दो प्रमुख मुद्दों पर विशेष जोर दिया:


1. ब्याज अनुदान योजना (Interest Subvention) की पुनर्बहाली 

   कालीन उद्योग में निर्यातकों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए ब्याज अनुदान योजना बेहद महत्वपूर्ण रही है। इस योजना के तहत निर्यातकों को कम ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जाता था, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी की जरूरतें पूरी होती थीं। हालांकि, इस योजना को हाल के वर्षों में बंद कर दिया गया, जिससे छोटे और मध्यम निर्यातकों को भारी वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है। श्री वाटल ने इस योजना को तत्काल पुनर्जनन की मांग की, ताकि उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया जा सके।


2. ट्रंप प्रशासन के टैरिफ का प्रभाव

   अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों पर लगाए गए टैरिफ ने उद्योग की वैश्विक बाजार में स्थिति को कमजोर किया है। ये टैरिफ भारतीय कालीनों की कीमत को बढ़ाते हैं, जिससे वे अन्य देशों के कालीनों की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं। श्री वाटल ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर अमेरिकी प्रशासन के साथ कूटनीतिक बातचीत शुरू करने और टैरिफ में छूट दिलाने की अपील की।

     


आयकर अधिनियम की धारा 43B(H): एक अव्यावहारिक नियम  

CEPC के निदेशक श्री संजय कुमार गुप्ता ने आयकर अधिनियम की धारा 43B(H) के तहत MSME को 45 दिनों के भीतर भुगतान अनिवार्य करने वाले प्रावधान को कालीन उद्योग के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त बताया। उन्होंने तर्क दिया कि हस्तनिर्मित कालीनों का उत्पादन एक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है। 



> “एक हस्तनिर्मित कालीन को बनाने में 6 से 10 महीने का समय लगता है। इसके बाद इसे प्रक्रिया में भेजना, निर्यात करना और भुगतान प्राप्त करना—यह पूरा चक्र अक्सर एक वर्ष से अधिक का समय लेता है। ऐसे में 45 दिनों की भुगतान समय-सीमा न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि उद्योग के लिए आर्थिक रूप से हानिकारक भी है।”  

> — श्री संजय कुमार गुप्ता, निदेशक, CEPC


श्री गुप्ता ने इस प्रावधान में कालीन उद्योग के लिए विशेष छूट की मांग की, ताकि निर्यातकों पर अनावश्यक दबाव न पड़े और उद्योग की कार्यक्षमता बनी रहे।


तुर्की के मशीन-निर्मित कालीनों पर पारस्परिक टैरिफ की मांग

  

बैठक में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया—तुर्की से आयातित मशीन-निर्मित कालीनों का भारतीय बाजार पर बढ़ता प्रभाव। ये कालीन कम लागत और तेज उत्पादन के कारण भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों के लिए खतरा बन रहे हैं। श्री गुप्ता ने सरकार से मांग की कि तुर्की के कालीनों पर पारस्परिक टैरिफ (Reciprocal Tariff) लगाया जाए, ताकि भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों को घरेलू बाजार में उचित संरक्षण मिल सके। इससे न केवल स्थानीय कारीगरों को लाभ होगा, बल्कि भारतीय हस्तकला की विशिष्टता को भी बढ़ावा मिलेगा।


हस्तनिर्मित और मशीन-निर्मित कालीनों के लिए अलग HS कोड 

निर्यातकों ने एक और महत्वपूर्ण सुझाव दिया—हस्तनिर्मित और मशीन-निर्मित कालीनों के लिए अलग-अलग HS (Harmonized System) कोड निर्धारित करने की आवश्यकता। वर्तमान में दोनों प्रकार के कालीनों के लिए एक ही HS कोड का उपयोग किया जाता है, जिससे वैश्विक बाजार में भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों की विशिष्ट पहचान प्रभावित होती है। अलग HS कोड लागू होने से निर्यात प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और भारतीय हस्तकला को वैश्विक स्तर पर बेहतर पहचान मिलेगी।



प्रतिनिधिमंडल में शामिल प्रमुख हस्तियां 

इस बैठक में सांसद श्री विनोद बिंद के नेतृत्व में एक मजबूत प्रतिनिधिमंडल शामिल था, जिसमें CEPC के चेयरमैन श्री कुलदीप राज वाटल और निदेशक श्री संजय कुमार गुप्ता के अलावा कई प्रमुख निर्यातक मौजूद थे। इनमें शामिल थे:  

- श्री अशफ़ाक़ अहमद अंसारी  

- श्री उमेश शुक्ला  

- श्री सत्तार अंसारी  

- श्री असीम अंसारी (बॉबी)  

- श्री सादिक अंसारी  

- श्री शाहिद अंसारी  


इन निर्यातकों ने उद्योग की जमीनी हकीकत और व्यावहारिक समस्याओं को विस्तार से साझा किया। उन्होंने कारीगरों की आर्थिक स्थिति, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सरकारी नीतियों के प्रभाव जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला।



वाणिज्य राज्य मंत्री का आश्वासन 

वाणिज्य राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद ने प्रतिनिधिमंडल द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों को गंभीरता से सुना। उन्होंने आश्वासन दिया कि इन सुझावों को वाणिज्य मंत्रालय में प्राथमिकता के आधार पर उठाया जाएगा। श्री प्रसाद ने कहा:  


 “भारतीय कालीन उद्योग हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है और इसे वैश्विक बाजार में और मजबूत करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। हम इन मुद्दों पर विचार करेंगे और उद्योग के हित में आवश्यक नीतिगत कदम उठाएंगे।”  


उन्होंने यह भी कहा कि ब्याज अनुदान योजना, टैरिफ मुद्दों और HS कोड जैसे सुझावों पर संबंधित विभागों के साथ चर्चा की जाएगी, ताकि समयबद्ध समाधान निकाला जा सके।


कालीन उद्योग का महत्व  

भारतीय कालीन उद्योग न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह लाखों कारीगरों और उनके परिवारों की आजीविका का आधार भी है। यह उद्योग भारत के निर्यात राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देता है, विशेष रूप से अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व जैसे बाजारों में। हालांकि, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, बढ़ती लागत और नीतिगत बाधाओं ने उद्योग की वृद्धि को प्रभावित किया है। इस बैठक को उद्योग के लिए एक नई उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है।




आगे की राह  

इस बैठक के बाद कालीन उद्योग के हितधारकों में एक सकारात्मक उत्साह देखा जा रहा है। निर्यातक और कारीगर अब सरकार से ठोस कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं। विशेष रूप से, ब्याज अनुदान योजना की पुनर्बहाली और धारा 43B(H) में छूट जैसे कदम उद्योग को तत्काल राहत प्रदान कर सकते हैं। साथ ही, तुर्की के कालीनों पर टैरिफ और अलग HS कोड जैसे दीर्घकालिक उपाय भारतीय कालीनों की वैश्विक पहचान को और मजबूत करेंगे।

भारतीय कालीन उद्योग की समस्याओं को लेकर यह बैठक एक महत्वपूर्ण कदम है। सांसद श्री विनोद बिंद के नेतृत्व और वाणिज्य राज्य मंत्री श्री जितिन प्रसाद के सकारात्मक रुख ने उद्योग के लिए नई संभावनाएं खोली हैं। अब यह देखना होगा कि सरकार इन सुझावों को कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से लागू करती है। भारतीय हस्तकला की यह धरोहर न केवल आर्थिक विकास का प्रतीक है, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान को भी विश्व पटल पर ले जाती है।


आपके विचार  

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