भदोही। गरीब और जरूरतमंद परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना को लेकर समय-समय पर अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं। अब मेडिसिन संबंधी इलाज के दौरान आयुष्मान कार्ड धारकों को कथित तौर पर होने वाली परेशानियों को लेकर गंभीर शिकायतें सामने आ रही हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कुछ अस्पतालों में आयुष्मान कार्ड से इलाज कराने वाले मरीजों से पैकेज तैयार करने के नाम पर शुरुआत में कई तरह की जांच और दवाएं मंगाई जाती हैं। आरोप यह भी है कि पैकेज के तहत इलाज की अवधि समाप्त होने के बाद, मरीज पूरी तरह स्वस्थ न होने के बावजूद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है। मरीजों के परिजनों का कहना है कि कई बार बीमारी ऐसी होती है जिसमें मरीज को कुछ और दिनों तक चिकित्सकीय निगरानी, दवा और उपचार की आवश्यकता होती है। लेकिन पैकेज की सीमा समाप्त होने के बाद परिवार के सामने दो विकल्प रह जाते हैं—या तो आगे का इलाज अपने खर्च पर कराया जाए या मरीज को घर ले जाया जाए।
‘15 दिन बाद दोबारा भर्ती’ का दावा
कुछ मरीजों और उनके परिजनों की ओर से यह भी दावा किया जा रहा है कि पैकेज समाप्त होने के बाद दोबारा आयुष्मान योजना के तहत भर्ती के लिए निर्धारित अंतराल का हवाला दिया जाता है। ऐसे में गंभीर मरीज और उसके परिवार के सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो जाती है। शिकायतकर्ताओं का सवाल है कि यदि मरीज को अभी भी इलाज की आवश्यकता है तो केवल पैकेज की अवधि पूरी होने के आधार पर उपचार रोकना कितना उचित है? उनका कहना है कि योजना का उद्देश्य गरीब मरीजों को गुणवत्तापूर्ण और कैशलेस इलाज उपलब्ध कराना है, न कि उन्हें अधूरे इलाज के बाद बीच में छोड़ देना।
सरकारी रिकॉर्ड और मरीज की वास्तविक स्थिति में अंतर का आरोप
कुछ लोगों ने यह आरोप भी लगाया है कि अस्पतालों की ओर से मरीज के इलाज और स्वस्थ होकर घर लौटने की तस्वीरें अथवा रिकॉर्ड तैयार कर योजना के तहत बेहतर प्रदर्शन दिखाया जाता है, जबकि वास्तविक स्थिति में मरीज को आगे भी उपचार की आवश्यकता रहती है। हालांकि, ऐसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और किसी भी अस्पताल या चिकित्सक के खिलाफ निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड, डिस्चार्ज समरी, पैकेज विवरण और अस्पताल का पक्ष सामने आना जरूरी है।
सरकार से व्यवस्था की समीक्षा की मांग
आयुष्मान कार्ड धारकों और उनके परिजनों की मांग है कि सरकार और संबंधित स्वास्थ्य विभाग ऐसे मामलों की निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करें। उनका कहना है कि अस्पताल में भर्ती मरीज की चिकित्सकीय स्थिति को प्राथमिकता दी जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि केवल पैकेज की अवधि समाप्त होने के कारण आवश्यक उपचार बाधित न हो।योजना के आधिकारिक ढांचे में अस्पतालों द्वारा उपचार और पैकेज से जुड़े प्री-ऑथराइजेशन तथा क्लेम की प्रक्रियाएं दर्ज की जाती हैं। ऐसे में शिकायतकर्ताओं का कहना है कि मरीज की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति और अस्पताल द्वारा किए गए दावे का मिलान करने की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए।
‘आयुष्मान का मतलब अधूरा इलाज नहीं’
गरीब मरीजों के परिजनों का कहना है कि इलाज का उद्देश्य मरीज को स्वस्थ करना होना चाहिए। उनका सवाल है कि यदि कोई मरीज वास्तव में आगे के उपचार का हकदार है, तो केवल आर्थिक पैकेज की सीमा उसके इलाज में बाधा क्यों बने?उन्होंने सरकार से मांग की है कि आयुष्मान योजना के तहत मेडिसिन वाले मरीजों के इलाज, डिस्चार्ज प्रक्रिया, दोबारा भर्ती और पैकेज की अवधि की गहन समीक्षा की जाए तथा शिकायत सही पाए जाने पर संबंधित अस्पतालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
नोट: यह खबर मरीजों/परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों और उठाए गए सवालों पर आधारित है। संबंधित अस्पतालों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।

